(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.41. अध्यायः 041
अथानुगीतापर्व-2
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
ब्रह्मणा महर्षीन्प्रति महदहङ्कारतत्वनिरूपणम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

ब्रह्मोवाच।

अव्यक्तात्पूर्वमुत्पन्नो महानात्मा महामतिः।
आदिर्गुणानां सर्वेषां प्रथमः सर्ग उच्यते॥ 14-41-1(93472)
महानात्मा मतिर्विष्णुर्जिष्णुः शंभुश्च वीर्यवान्।
बुद्धिः प्रज्ञोपलब्धिश्च तता ख्यातिर्धृतिःस्मृतिः। 14-41-2(93473)
पर्यायवाचकैः शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते।
तं जानन्ब्राह्मणो विद्वान्प्रमोहं नाधिगच्छति॥ 14-41-3(93474)
सर्वतःपाणिपादं च सर्वतोक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वं व्याप्यवतिष्ठति॥ 14-41-4(93475)
महाप्रभावः पुरुषः सर्वस्य हृदि निष्ठितः।
अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः॥ 14-41-5(93476)
तत्र बुद्धिमतां लोके सद्भावनिरताश्च ये।
ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसन्धा जितेन्द्रियाः॥ 14-41-6(93477)
ज्ञानवन्तश्च ये केचिदलुब्धा जितमन्यवः।
प्रसन्नमनसो धीरा निर्ममा निरहंक्रियाः॥ 14-41-7(93478)
विमुक्ताः सर्व एवैते महत्त्वमुपयान्त्युत।
आत्मनो महतो वेद यः पुण्यां गतिमुत्तमाम्॥ 14-41-8(93479)
अहङ्कारात्प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्॥ 14-41-9(93480)
तेषु भूतानि युज्यन्ते महाभूतेषु पञ्चसु।
ते शब्दस्पर्शरूपेषु रसगन्धक्रियासु च॥ 14-41-10(93481)
महाभूतविनाशान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते।
सर्वप्राणभृतां धीरा महदुत्पद्यते भयम्॥ 14-41-11(93482)
स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति।
विष्णुरेवादिसर्गेषु स्वयंभूर्भवति प्रभुः॥ 14-41-12(93483)
एवं हि यो वेद गुहाशयं प्रभुं
परं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम्।
हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं
स बुद्धिमान्बुद्धिमतीत्य तिष्ठति॥ 14-41-13(93484)
य उत्पन्नो महान्पूर्वमहङ्कारः स उच्यते।
अहमित्येव सम्भूतो द्वितीयः सर्ग उच्यते॥ 14-41-14(93485)
अहङ्कारश्च भूतादिर्वैकारिक इति स्मृतः।
तेजसश्चेतना धातुः प्रजासर्गः प्रजापतिः॥ 14-41-15(93486)
देवानां प्रभवो देवो मनसश्च त्रिलोककृत्।
अहमित्येव तत्सर्वमभिमानः स उच्यते॥ 14-41-16(93487)
अध्यात्मज्ञानतृप्तानां मुनीनां भावितात्मनाम्।
स्वाध्यायक्रतुसिद्धानामेष लोकः सनातनः॥ 14-41-17(93488)
अहङ्कारेणाहरतो गुणानिमा-
न्भूतादिरेवं सृजते स भूतकृत्।
वैकारिकः सर्वमिदं विचेष्टते
स्वतेजसा रञ्जयते जगत्तथा॥ ॥ 14-41-18(93489)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि एकचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 41 ॥


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